गंगा में अस्थियों को विसर्जित करने का यह है धार्मिक एवं वैज्ञानिक कारण

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हालांकि दूसरी नदियों में भी अस्थियों को विसर्जित किया जाता है, मगर फिर भी अस्थियां विसर्जन के लिए सबसे ज़्यादा महत्व गंगा नदी को ही दिया जाता है। आइए जानते हैं, अस्थियां प्रवाहित करने का गंगा से क्या कनेक्शन है। गंगा को पूजनीय मानने के पीछे की मान्यता है कि गंगा का उद्गम भगवान विष्णु के चरणों से हुआ था, इसके बाद सृष्टि के पालनहार शिव ने उन्हें अपनी जटाओं में रखा फिर इसके बाद वे पृथ्वी पर आई।

वहीं गरुड़ पुराण जैसे कई ग्रंथों में गंगा को स्वर्ग की नदी कहा गया है, इसके साथ ही गंगा को देव नदी भी कहा जाता है यानी देवताओं की नदी। ऐसे में यह मान्यता है कि जिसका निधन गंगा किनारे हो जाये वो हर पाप से मुक्त हो जाता है, और उसका भगवान विष्णु के धाम बैकुंठ जाने का रास्ता साफ हो जाता है। इसके साथी ही सनातन धर्म में मान्यता है कि अगर अस्थियों को गंगा में प्रवाहित किया जाएगा तो उनके प्रियजन की आत्मा को शांति मिलेगी।

वहीं मोक्ष दायनी माँ गंगा के स्पर्श से मृतक के लिए स्वर्ग के दरवाज़े खुल जाते हैं। बता दें चाहे गंगा पृथ्वी पर प्रवाहित होती हो, मगर इसका निवास स्थान स्वर्ग ही बताया गया है। इसके साथ ही एक मान्यता यह भी है कि जो गंगा के किनारे देह का त्याग करते हैं, उन्हें यम अपने दंड से नहीं डराता।

वहीं अगर अस्थियां विसर्जन को वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो यह परिणाम मिलता है कि अस्थियों में कैल्शियम और फॉस्फोरस अत्यधिक मात्रा में होता है, यह अगर खाद रूप में मिट्टी में जाता है तो इससे मिट्टी अत्यधिक उपजाऊ होती है। वहीं जलीय जंतु के लिए भी यह एक पौष्टिक आहार का काम करता है। इसके साथ ही गंगा देश की बड़ी नदी में से एक है, इसके पानी से एक बड़ा भाग सिंचित होता है। ऐसे में इसकी उर्वरक शक्ति क्षीण ना हो इसके लिए इसमें अस्थियां विसर्जित की जाती है।

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